मनोज्ञ और अमनोज्ञ में समभाव रहने से हो सकती है कर्मों की निर्जरा : आचार्यश्री महाश्रमण
-आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को आर्त ध्यान में न जाने की दी प्रेरणा -आचार्यश्री के श्रीमुख से ‘तेरापंथ प्रबोध’ का वर्णन सुन श्रद्धालु हुए निहाल -श्रद्धालुओं को साध्वीवर्याजी से मिली अनासक्तिमय जीवन जीने की प्रेरणा 29 अगस्त 2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल) (JTN) : जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल को अध्यात्म समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने श्रीमुख से मनोज्ञ और अमनोज्ञ स्थितियों में भी आर्त ध्यान में न जाने की पावन प्रेरणा प्रदान की तो वहीं दोनों स्थितियों को समभाव से सहन करने से कर्मों को काटने की पावन प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को ‘तेरापंथ प्रबोध’ का संगान व वाचन कर सरल भाषा में उसकी व्याख्या कर भी श्रद्धालुओं को निहाल कर दिया। वर्तमान में कोलकाता के राजरहाट स्थित ‘महाश्रमण विहार’ में वर्ष 2017 का चातुर्मासिक काल परिसंपन्न कर रहे महातपस्वी के दरबार से नियमित ज्ञानगंगा का प्रवाह होता है जो समूचे मानव जाति का कल्याण करने वाली साबित ...