विवेक से होता है सही और गलत का बोध : आचार्यश्री महाश्रमण
22-10-2019 मंगलवार , कुम्बलगोडु, बेंगलुरु, कर्नाटक, तेरापंथ धर्मसंघ के 11 वें अधिशास्ता-शांतिदूत-अहिंसा यात्रा के प्रणेता-महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने मंगल प्रवचन में फरमाया कि जब तक आदमी अंतर्मुखी नहीं बनता है तब तक वह बाह्य आसक्तिपूर्ण प्रवृत्तियों को नहीं छोड़ सकता है। आसक्ति को नहीं छोड़ने के कारण उसे आत्मीय आनंद का अंश नहीं मिल पाता है। व्यक्ति इंद्रियों के माध्यम से बाह्य जगत से जुड़ा हुआ रहता है और सांसारिक कार्यों को संपन्न करता है। व्यक्ति को अपने जीवन में आवश्यक और अनावश्यक का विवेक रखना चाहिए। इसके माध्यम से साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ा जा सकता है। हर व्यक्ति को यह प्रयास करना चाहिए कि वह अनावश्यक क्रियाओं से बचे। चाहे अनावश्यक रूप से बोलना, सुनना या खाना कुछ भी हो इससे बचने का प्रयास करना चाहिए। जब आसक्ति की भावना बढ़ जाती है तो वह अनावश्यक कार्यों में आगे बढ़ जाता है। कई बार इससे गलत परिणाम भी देखने को मिलते हैं। आचार्य प्रवर ने फरमाते हुए कहा कि मौन की साधना अच्छी साधना होती है परंतु व्यक्ति को यह विवेक भी रखना चाहिए कि वह अपने मुंह से कटु बात, झूठ और...