आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी द्वितीय चरण : अभिनव सामयिक आराधना
गंगाशहर।
बुधवार को नैतिकता के शक्तिपीठ तुलसी समाधि स्थल के प्रेक्षाध्यान प्रांगण
में 150वें मर्यादा महोत्सव के द्वितीय दिन एवं आचार्य तुलसी जन्मशताब्दी
समारोह के द्वितीय चरण के अंतिम दिन के अवसर पर आचार्यप्रवर महाश्रमण ने
अपने व्याख्यान में कहा कि शिष्य विचार करता है कि मैं अपने गुरु की
महापूजा करुं क्योंकि उनसे मुझे अनुशासन और ज्ञान प्राप्त होता है, उनसे
शिक्षण-प्रशिक्षण मिलता है। शिष्य का बहुत गहरा संबंध गुरु के साथ होता है।
संसार में पिता-पुत्र का संबंध, भाई-भाई का संबंध तथा अनेक संबंध होते हैं
लेकिन गुरु-शिष्य का संबंध इतना मजबूत बन जाता है कि उसके आगे सारे संबंध,
रिश्ते-नाते गौण हो जाते हैं। गुरु-शिष्य का संबंध आध्यात्मिक होता है,
धार्मिक होता है। गुरु सखा भी होता है, गुरु भाई भी होता है और गुरु
माता-पिता व भगवान तुल्य भी होता है। अच्छा गुरु मिलना सौभाग्य की बात होती
है। जीवन जिसका त्यागपूर्ण और गरिमामय होता है, जो ज्ञान की आराधना करते
हैं तथा जो ज्ञान का दान देता है वही अच्छा गुरु होता है। जिस गुरु में
संयम, त्याग और ज्ञान नहीं वह किसी काम का नहीं। केवल उपदेश, निर्देश,
आदेश, संदेश देने वाला गुरु नहीं कहलाता। यह सब तो गुरु की जीवनशैली से ही
मिल जाता है। दुनिया में योग्य गुरु मिलना बहुत कठिन है। गुरुदेव तुलसी
बहुत कम उम्र में ही गुरु बन गए। तेरापंथ शासन में वे सम्राट-चक्रवर्ती बन
गए। उनके जीवन में दयालुता थी, वे परोपकार के लिए अवतरित हुए थे।
गुरुदेव तुलसी के हाथों से
कितनों का निर्माण हुआ है। गुरुदेव तुलसी स्वयं सामयिक का अनुभव करवाते
थे। अभिनव सामयिक का प्रयोग करवाना तुलसी का प्रिय विषय था। सामयिक करना एक
धार्मिक अनुष्ठान है। बारहव्रतों में से नवमा व्रत है सामयिक। सामयिक की
विधि होती है जिसमें वेशभूषा साधु की तरह होती है। सामयिक का अर्थ है कि
श्रावक जिंदगीभर के लिए साधु नहीं बनता तो कुछ समय वह सामयिक करके साधु
जीवन जीए। सामयिक आंतरिक सुख देती है। सामयिक ध्यानपूर्वक करनी चाहिए,
सामयिक के समय कोई अन्य कार्य न करें। सामयिक में जप, ध्यान और ग्रंथ पढ़
सकते हैं। धर्म की चर्चा, तत्व की चर्चा में भी सामयिक हो सकती है। ध्यान
रहे सामयिक के दौरान असत्य वचन न निकले। परिग्रह की चेतना सुसुप्त हो जानी
चाहिए। मुखवस्त्रिका मुख पर रहे, दरी पर न बैठें, स्वयं का आसन प्रयोग में
लें। सफेद चादर शरीर पर रखें तथा पूंजनी साथ में रखें। पद्मासन अथवा सुखासन
जिसमें भी आराम से बैठा जा सके उस आसन में बैठें तथा एक-दूसरे का स्पर्श न
हो इसका ध्यान रहे। श्रावक को रोज एक बार तो सामयिक करनी ही चाहिए।
महाश्रमणजी ने व्याख्यान में कहा कि तुलसी ने मानवता
की सेवा में अपना योगदान दिया। तेरापंथ धर्मसंघ करीब 254 वर्ष पहले शुरू
हुआ था और आचार्य भिक्षु ने इसकी स्थापना की थी। नवमें गुरु तुलसी ने लगभग
60 वर्ष तक तेरापंथ शासन की बागडोर संभाली और उनके उत्तराधिकारी
महाप्रज्ञजी हुए। महाप्रज्ञजी दार्शनिक और चिंतक थे। अपना चिंतन, नेताओं,
जनता के सामने प्रस्तुत किया। तुलसी ने अणुव्रत संदेश देकर मानवता की अच्छी
सेवा की। सम्प्रदाय भी विकास में सहायक है, सम्प्रदाय से साधना भी की जा
सकती है, लेकिन इतना वांछनीय है कि साम्प्रदायिक उन्माद नहीं फैले। तुलसी
ने हमें जीवन विज्ञान और प्रेक्षाध्यान की बात बताई। विकास के पांच आयाम
बताते हुए महाश्रमणजी ने कहा कि पहला आयाम आर्थिक है। आर्थिक विकास जरुरी
है देश का। दूसरा आयाम भौतिक विकास, तीसरा आयाम नैतिकता का विकास, चौथा
आयाम आध्यात्मिक विकास और पांचवां आयाम ज्ञानात्मक विकास है।
महाश्रमणजी ने कहा कि शिक्षा में भावात्मक विकास भी होना चाहिए। आज
शिक्षा के प्रति सरकार और अभिभावक दोनों ही जागृत हैं। लेकिन शिक्षा के साथ
ये पांचों विकास हो जाएं तो संपूर्ण विकास हो सकता है।
राजनीति
एक सेवा का साधन है जिससे जनता की सेवा हो सकती है। राजनीति जरुरी है जिससे
संचालन में बाधा न आए। यदि राजनीति में राजनेता सेवा न करे तो वह इंसान
नहीं पशु के समान है। जनता की बातों को धैर्य से सुनना और उनकी समस्याओं का
समाधान करना यह राजनेता का धर्म है।
हजारों श्रावकों ने की सामयिक
बुधवार को
प्रेक्षाध्यान प्रांगण में हजारों श्रावकों ने अभिनव सामयिक का प्रयोग
आचार्यश्री महाश्रमण के सान्निध्य में किया। गुरुदेव के निर्देशानुसार
हजारों श्रावकों में ४८ मिनट की इस सामयिक का अद्भुद नजारा दिखाई दे रहा
था। सर्वप्रथम त्रिपदी वंदना विधि, सामयिक पाठ, ध्यान योग का प्रयोग,
स्वाध्याय योग का प्रयोग, त्रिगुप्ती साधन का प्रयोग और फिर सामायिक आलोचना
पाठ किया गया। सामायिक आलोचना पाठ के बाद नमस्कार महामंत्र तथा परमेष्ठी
वंदना सामूहिक रूप से की गई। अभिनव सामयिक के बाद महाश्रमणजी ने कहा कि
चौविहार अथवा तिविहार रात्रि भोजन का परिहार करें। झूठ बोलने से बचें
कदाचित् इस संदर्भ में स्खलना हो जाए, झूठ बोलना पड़ जाए, एक दिन बोले गए
झूठ के परिशोधन के लिए एक उपवास अवश्य करें। व्यक्तित्व निर्माण के लिए एक
वर्ष तक ब्रह्मचर्य की साधना का प्रयोग करें।
कन्या मंडल ने 'मर्यादा महोत्सव आयोÓ तथा तेरापंथ युवक परिषद ने 'मां
वदना जी रो लाल कठैÓ गीतिका प्रस्तुत की। कार्यक्रम में मुनिश्री दर्शन
कुमार, मुनिश्री मदन कुमार तथा मुनिश्री विकास कुमार ने अपने विचार रखे।
डाकलिया बंधु के कन्हैयालाल, भंवरलाल, प्रकाश, राजेश, जितेन्द्र तथा
धर्मेन्द्र डाकलिया ने भावपूर्ण गीतिका प्रस्तुत की। तेरापंथी महासभा के
अध्यक्ष हीरालाल मालू ने तुलसी जन्म शताब्दी समारोह की आरंभ से अंतिम दिवस
तक की रूपरेखा प्रस्तुत की। सरदारशहर निवासी तथा अहमदाबाद प्रवासी मनीष
बरडिय़ा द्वारा आचार्य तुलसी पर आधारित साढ़े तीन मिनट की एक एनीमेशन फिल्म
प्रसारित की गई। नेपाल से आए श्रावकों ने भी सामुहिक गीतिका प्रस्तुत की।
मुनिश्री महेन्द्र कुमार
स्वामी ने कहा कि आचार्य पद पर रहते हुए तुलसी ने मानवता कल्याण के लिए
अपना जीवन समर्पित कर दिया। गुरुदेव तुलसी कठोरता और कोमलता के संगम थे।
उन्हें देखकर भक्ति और शक्ति दोनों के दर्शन होते थे।
मर्यादा महोत्सव व्यवस्था
समिति के संयोजक हंसराज डागा ने आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी समारोह-द्वितीय
चरण की शुरुआत करते हुए कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व केन्द्रीय मानव
संसाधन मंत्री डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, दिल्ली सरकार के नेता प्रतिपक्ष डॉ.
हर्षवर्धन तथा विधानसभा सदस्य प्रवेश वर्मा का कार्यक्रम में अभिनन्दन
किया। समारोह के दौरान तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष हीरालाल मालू ने डॉ.
मुरलीमनोहर जोशी को स्मृति चिह्न, तेरापंथी महासभा के महामंत्री विनोद
चौरडिय़ा, हंसराज डागा, व्यवस्था समिति के सहसंयोजक महावीर रांका तथा जतन
दूगड़ ने भी डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, डॉ. हर्षवर्धन तथा प्रवेश वर्मा को
स्मृति चिह्न तथा पुस्तक भेंट कर उनका स्वागत अभिनन्दन किया।
मीडिया एवं सूचना प्रभारी
धर्मेन्द्र डाकलिया ने बताया कि मुख्य अतिथि डॉ. मुरलीमनोहर जोशी, डॉ.
हर्षवर्धन तथा प्रवेश वर्मा के साथ कार्यक्रम में विधायक गोपाल जोशी, शहर
भाजपा अध्यक्ष नन्दकिशोर सोलंकी, अविनाश जोशी सहित गणमान्य लोग उपस्थित थे।

DEAR SANJAYJI
ReplyDeleteCAN I GET THE JAP ANUSTHAN DONE UNDER SAMAYIK ANUSTHAN AS PRESCRIBED BY GURUDEV AACHARYA MAHASHRAMNJI