साधक हर समय जागरूक रहे - मंत्री मुनि सुमेरमल जी


जो आदमी जीवों अजीवों को जनता है,वह संयम को भी जान लेता है। श्रावक के लिए नव तत्वों को जानना जरूरी है। जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष। जीव अजीव का बोध होने के बाद त्याग प्रत्याख्यान आता है और फिर त्याग में भी दृढ़ता। आत्मा शाश्वत है और शारीर अशाश्वत है। मृत्यु के लिए कोई भी अवसर/समय नहीं है। प्रकृति का नियम है शरीर एक दिन अवश्य छुटेगा। शरीर छुटे तो छुटे पर आत्मा का सम्बन्ध ना छुटे। साधना की भावना न छुटे। इतनी निष्ठा होनी चाहिए कि अपने आदर्शों के लिए कुछ भी जाए तो जाए पर आदर्श न जाए।
2 प्रकार के आदर्श बताये जाते है:


1. व्यक्तिपरक आदर्श: किसी व्यक्ति को सामने रखकर उसकी जीवन शैली का निर्धारण करना।
2. सिद्धांत परक आदर्श: किसी तथ्य को सामने रखकर आदर्शों का निर्धारण करना।
शास्त्रकारों ने कहा है श्रावक को 6 काय, जीव अजीव का बोध होना चाहिए, तत्व ज्ञान होना चाहिए। यह भी कहा गया है कि श्रावक में सम्यग दर्शन, सम्यग श्रद्धा भी होनी चाहिए। सच्चाई यथार्थ के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए। वही सत्य है जो "जिन" भगवानों ने निर्दिष्ट किया है। सच्चाई के लिए सम्प्रदाय को भी गौण किया जाना चाहिए। श्रावक में देव, गुरु, धर्म के प्रति श्रद्धा/ आस्था हो। नव तत्व का यथार्थ ज्ञान हो। विवेक भी हो। त्याग प्रत्याख्यान की क्रिया भी हो। श्रद्धा, विवेक, त्याग प्रत्याख्यान का योग होने से आदमी श्रावक बनता है और सभी अच्छा श्रावक बनने का प्रयास करे।


मुनि ने फ़रमाया कि शास्त्रकारों ने कहा है जिन व्यक्तियों ने अध्यात्म के क्षेत्र में अपने आप को समर्पित कर दिया उनका काम है निरंतर आत्मा की दिशा में आगे बढते रहना। हर व्यक्ति के जीवन में अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति आती है। उनमे समत्व को साधे रखने वाला व्यक्ति ही आगे बढ़ता है। जो विचलित हो जाता है वह व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने में विलम्ब कर देता है। साधक हर समय जागरूक रहे कि ऐसा कोई काम न हो जिससे मेरी साधना में स्खलना आये या राग द्वेष के वशीभूत हो जाऊँ। अध्यातम की साधना में चलते हैं तो एक लक्ष्य रहना चाहिए कि साधना की गति करे, प्रगति करे। जो व्यक्ति समत्व के साथ साधना में निरंतर गतिमान रहता है, वर्धमान रहता है, नियमो का पालन कर सकता है, वह व्यक्ति अपनी मंजिल को प्राप्त करता है।
रवि मालू के द्वारा गीत की प्रस्तुति हुई। समणी पूण्य प्रज्ञा जी द्वारा वक्तव्य हुआ। कानपुर से पधारे गणमान्य व्यक्तियों धनराज जी सुराणा आदि द्वारा 151वें मर्यादा महोत्सव के  बैनर का अनावरण पूज्यप्रवर के सानिध्य में हुआ। आज समणी कुसुम प्रज्ञा द्वारा लिखित पुस्तक "आचार्य तुलसी का राष्ट्र को अवदान" का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम का सञ्चालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।

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