साधक को शरीर के मोह का त्याग करना चाहिए : आचार्यश्री महाश्रमण
-प्रवास के अंतिम दिन आचार्यश्री ने धुबड़ीवासियों को प्रदान की सम्यत्व दीक्षा (गुरुधारणा)-
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| आचार्यश्री महाश्रमणजी |
31 दिसम्बर 2016, धुबड़ी (असम) (JTN), तेरापंथ धर्मसंघ के महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रवास के अंतिम दिन और साल के अंतिम दिन अर्थात शनिवार को शंकरदेव शिशु उद्यान (चिल्ड्रेन पार्क) में बने मंगल समवसरण के पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को अपनी मंगलवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि साधना करने वाला व्यक्ति देहावास को सदा के लिए छोड़ देता है। यह आत्मा और शरीर का मिलन अशाश्वत है। यह बना हुआ संबंध कभी न कभी टूटने वाला है। जिसका संबंध उसका वियोग अवश्य होता है। संयोग का अंत वियोग होता है। आदमी का शरीर अशाश्वत है, इसलिए आदमी को शरीर के प्रति अत्यधिक मोह नहीं करने का प्रयास करना चाहिए। जो साधक आत्मा के हित में लगा रहता है, वह देहावास से मुक्ति प्राप्त सकता है और मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। आचार्यश्री ने साधुओं और गृहस्थों को शरीर से मोह न करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि जब मौत आती है तो अपने लोग परिजन या स्नेही जन भी व्यक्ति के लिए त्राण और शरण नहीं बन सकते। मौत से कोई किसी को नहीं बचा सकता। आचार्यश्री ने इसके लिए धर्मसंघ के नवें आचार्यश्री तुलसी के समय में मुनि कनकजी के देहावसान के घटनाक्रम को बताते हुए कहा कि मृत्यु से कोई किसी को नहीं बचा सकता। यह शरीर नश्वर है। इसलिए आदमी साधना के माध्यम से मोक्ष प्राप्त कर हमेशा के लिए शरीर का त्याग कर सके तो यह उसकी आत्मा के लिए अच्छी बात हो सकती है।
आचार्यश्री ने साल के अंतिम दिन विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि हमारा असम में महीनों प्रवास हुआ। नागालैंड और मेघालय की यात्रा भी हुई। आचार्य भिक्षु से जुड़ा क्षेत्र केलवा में हमने जो भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम के गुवाहाटी में चतुर्मास करने की बात फरमायी थी वह सम्पन्न हो चुका है और हम असम की यात्रा सुसम्पन्न कर बंगाल की सीमा में प्रवेश करने वाले हैं। असम में त्रिसूत्रीय सूत्र लेकर आए थे। इससे श्रवकों के साथ अन्य लोगों ने इसे जाना, इससे जुड़ा और इसे यथासंभव ग्रहण करने का प्रयास किया होगा। यह सूत्र लोगों के जीवन का कल्याण करने वाला बन सके, लोगों में धर्म-साधना की प्रभावना प्रगाढ़ हो, लोगों के जीवन में शांति रहे, चित्त समाधि में रहे और असम यात्रा की सम्पन्ना के बाद भी लोगों में इसकी प्रभावना और धार्मिकता के भाव पुष्ट रहें, मंगलकामना।
आचार्यश्री ने सम्यक्त्व दीक्षा के निर्धारित समय पर उपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री यथाविधि सम्यक्त्व दीक्षा प्रदान की। और उन्हें प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि देव, गुरु और धर्म के प्रति श्रद्धा का पूरे जीवन के समर्पित कर देना, नमस्कार महामंत्र का प्रतिदिन जप करने का प्रयास हो तो अच्छा धर्मार्जन का कार्य हो सकता है। चेतना पवित्र हो सकती और आत्मीय शांति की प्राप्ति हो सकती है। आचार्यश्री ने दो विशेष प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि संवत्सरी का उपवास और शनिवार की सायं सात से आठ बजे के बीच सामायिक करने का क्रम भी श्रद्धालु जीवन में बना लें तो जीवन का क्रम बहुत अच्छा हो सकता है।
असाधारण साध्वीप्रमुखाजी ने आचार्यश्री की वाणी के प्रति श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि आप सभी ने आचार्यश्री से देहमुक्ति की प्रक्रिया के बोर में समझा, और अनित्य भावना के माध्यम से अपनी आत्मा के मूल रूप को प्राप्त कर सकते हैं। आत्मा को जानने का मार्ग दिखाने वाले गुरु ही होते हैं। आचार्यश्री से प्रेरणा प्रदान कर आदमी अपने जीवन का कल्याण कर सकता है। आचार्यश्री ने जन कल्याण के लिए अपने जीवन का परित्याग कर रखा है। स्वयं पदयात्रा कर लोगों को घरों तक पहुंच उन्हें अवगति प्रदान कर रहे हैं। आसमान से बरसती आग से गुरु की महिमा और कृपा ही बचाती है। इसलिए आचार्यश्री के शब्दों की ज्योति द्वारा स्वयं को जागृत करने का प्रयास करना चाहिए।
इसके पूर्व साध्वीवर्याजी ने श्रद्धालुओं को स्वयं की आत्मा को परमात्मा बनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जब किसी व्यक्ति की आत्मा संसारी मोह से मुक्त होती है तो परमात्मा बन जाती है। आत्मा से परमात्मा बनने की प्रक्रिया होती है, जिसे बिना सद्गुरु के प्राप्त नहीं किया जा सकता। हम सभी सौभाग्यशाली जो हमें ऐसे पथप्रदर्शक गुरु प्राप्त हैं। इनसे प्रेरणा प्राप्त कर राग-द्वेष से अपनी आत्मा को मुक्त करें तो आत्मा के मूल तत्व को प्राप्त कर परमात्मा बना जा सकता है।
मुख्यमुनिश्री ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि आज वर्ष 2016 की समाप्ति और वर्ष 2017 का प्रारम्भ होने वाला है। लोग यह सोंचे कि आत्मा के हित के लिए और जीवन की अच्छाई के लिए इस वर्ष कितना कुछ किया। आदमी को अपने जीवन का लेखा-जोखा करने का प्रयास करना चाहिए। मुख्यमुनिश्री ने आचार्यश्री से शनिवार की सामायिक की प्रेरणा लेकर वर्ष 2017 की प्रत्येक शनिवार की सामायिक करने को उत्प्रेरित किया। साथ ही भौतिक वस्तुओं का उपयोग धर्मसंघ की प्रभावना को बढ़ाने में प्रयोग करें न कि धर्मसंघ की गरिमा को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास होना चाहिए। नववर्ष पर यह संकल्प होना चाहिए कि देव, गुरु और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास बनाए रखें और अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करें। मुख्यमुनिश्री ने आचार्यश्री तुलसी द्वारा विरचित गीत ‘उतरती आलोचना’ का सुमधुर स्वर में संगान भी किया। मुनि मननकुमारजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी।
कार्यक्रम के अंत में आचार्यश्री महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति धुबड़ी के मंत्री श्री विमल ओसवाल, तेयुप गुवाहाटी के अध्यक्ष श्री बजरंग सुराणा, गुवाहाटी चतुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति के स्वागताध्यक्ष श्री रणजीत मालू, महामंत्री श्री सुपारस बैद, तेजपुर से दिलीप दूगड़, धुबड़ी के श्री अभयचंद बुच्चा ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं के सुमन अर्पित किए और आचार्यश्री से पावन आशीष प्राप्त किया। कार्यकम का कुशल संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।




Om Arham
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