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Showing posts from July, 2019

उपासक सेमिनार का हुआ बैंगलुरू में भव्य शुभारंभ

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संस्था शिरोमणि तेरापंथी महासभा के तत्वावधान में उपासक सेमिनार का भव्य शुभारंभ बैंगलुरू में उपासक श्रेणी के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि श्री योगेश कुमार जी की सन्निधि में हुआ।  उपासक श्रेणी के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनि श्री योगेश कुमार जी ने उपासक - उपासिकाओं को संबोधित किया। सेमिनार में मुनि श्री अक्षय कुमार जी, मुनि श्री ध्रुवकुमार जी, मुनि श्री सत्य कुमार जी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। इस अवसर पर महासभा के उपाध्यक्ष श्री कन्हैयालाल गिडिया, आचार्य महाश्रमण चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मूलचंद नाहर, महामंत्री श्री दीपचंद नाहर, उपासक श्रेणी के राष्ट्रीय संयोजक उपासक श्री डालमचंद नौलखा, राष्ट्रीय सहसंयोजक उपासक श्री सूर्यप्रकाश सामसुखा, उपासक श्री निर्मल नौलखा की गरिमामयी उपस्थिति थी। श्री मूलचंद नाहर व श्री दीपचंद नाहर ने स्वागत वक्तव्य दिया एवं संपूर्ण उपासक श्रेणी का स्वागत करते हुए व्यवस्था समिति की ओर से प्रतीक चिन्ह प्रदान किया। सेमिनार में अच्छी संख्या में उपासक - उपासिका उपस्थित थे।

आध्यात्मिक सुख ही सच्चा सुख - आचार्य श्री महाश्रमण जी

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दिनांक - 24 जुलाई 2019, बुधवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) : ABTYP JTN, अमृत पुरुष आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित सम्बोधि के दूसरे अध्याय के चतुर्थ श्लोक के बारे में सुख-दुःख की मीमांसा करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फ़रमाया कि - सुख दो प्रकार के होते है - एक पौदगलिक, दूसरा आध्यात्मिक, दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है कि एक भौतिक सुख है, एक आत्मिक सुख और तीसरे शब्द में यूँ भी कह सकते है, एक लौकिक और दूसरा लोकोत्तर।  सुख छोड़कर दुःख अपनाना ये बात मुनि मेघ को समझ नही आई तो उसने भगवान महावीर से प्रश्न किया कि भग़वन आदमी को सुख स्वाभाविक सा लगता है और दुःख अप्रिय तो सुख को ही क्यों ना अपनाए? इस बात का समाधान देते हुए प्रभु महावीर बताते है कि सुख पुदग़लों से शिष्ट होता है, पुदगल जन्य होता है, पदार्थ जन्य होता है, वह वस्तुतः दुःख होता है और मोहयुक्त है इसलिए आदमी को गर्त में ले जाता है। पहले जो सुखानुभूति है, उसका परिणाम अंत में दुःख ही है, इंद्रियों के विषयों से भोग से दुःख ही है, पाप की आत्मा को प्रारम्भ में सुख लगता है, पर बाद में दुःख ही दुःख होता है। भगवान महावीर...

"ऋषभदेव ने अपना लौकिक व लोकोत्तर कर्तव्य निभाया" - आचार्य श्री महाश्रमण

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आचार्य महाप्रज्ञ शताब्दी वर्ष के अवसर पर आचार्य महाप्रज्ञ द्वारा रचित "संबोधि" ग्रन्थ के वाचन का पूज्यप्रवर द्वारा हुआ शुभारम्भ दिनांक - 17 जुलाई 2019, बुधवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक) , आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ अध्यात्म साधना केंद्र परिसर के महाश्रमण समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए अमृत की वर्षा करने वाले अमृत पुरुष आचार्य श्री महाश्रमण जी ने भगवान ऋषभ का स्मरण करते हुए फरमाया कि भगवान ऋषभ इस अवसर्पिणी की तीर्थंकर परम्परा के 24 तीर्थंकरों में आदि तीर्थंकर थे, प्रथम तीर्थंकर थे । उनकी स्तुति में छोटा ग्रंथ रूप भक्तामर स्तोत्र आचार्य मानतुंग द्वारा रचित अपने प्रथम शब्द भक्तामर के नाम से प्रचलित है । जैसे उक्कीठणं पाठ अपने पहले शब्द "लोगस्स" के नाम से प्रचलित हैं। भगवान ऋषभ ग्रहस्थ थे, राजा थे, तीर्थंकर थे और उन्होंने अपना हर एक कर्तव्य निभाया । उन्होंने अपना गृहस्थ जीवन भी अच्छा जीया और सभी को जीवन जीने का प्रशिक्षण भी दिया । राजा थे, कर्तव्य था, जनता की भलाई का तो उनका लौकिक भला भी किया, असि-मसि-कृषि आदि कलाएँ सिखाई, यह सावद्य कार्य था, वे जानत...

तात्कालिक सुविधा को छोड़कर ही सत्य की राह पाई जा सकती है - आचार्य श्री महाश्रमण जी

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दिनांक - 16 जुलाई 2019, सोमवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक), ABTYP JTN, तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने अमृत वचनों से बैंगलुरूके मंगल पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया की - "त्वमेव सच्चम निमग्गा" आदमी के जीवन में सच्चाई की आराधना का महत्वपूर्ण स्थान होता है । काम कठिन है, आसान नही, सच्चाई की राह पर चलना, कंटकाकीर्ण पथ पर बढ़ना कितना मुश्किल है, साहस भी मुश्किल है, आदमी घबरा जाता है, तात्कालिक सुविधा को छोड़कर ही सत्य की राह पाई जा सकती है। आस्था नाम का तत्व है, वह आदमी में जग जाए, मज़बूत हो जाए तो वह क़ुर्बानी हेतु तैयार हो सकता है। आस्था का बल किसी-किसी को प्राप्त हो सकता है, वह फिर कष्टों की परवाह नही करता, चलना है तो रास्ता भी मिल जाता है, डरता नही । आचार्य भिक्षु सामान्य आदमी नही थे, विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी थे। विशेष बल पूर्व भव की साधना के कारण भी हो सकता है, तभी इस जन्म में इतना बल । वे वैरागी बने, गृहत्यागी बने यह बहुत बड़ी बात है। जिस समुदाय में गृहत्यागी बने वहाँ भी उन्हें संतोष नही हुआ, तब कोई क्रांति या अभ...

संघ में संघ के तरीक़े से रहना चाहिए - आचार्य श्री महाश्रमण जी

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● अध्यात्म की साधना में मोक्ष गंतव्य हैं ● आत्मा रूपी घड़े में रोज़ तप का संचय करना चाहिए ● चतुर्मासिक चतुर्दशी पर लेख पत्र का हुआ वाचन दिनांक - 15 जुलाई 2019, सोमवार - कुम्बलगुडु, बेंगलुरु (कर्नाटक), JTN, पूज्यप्रवर आचार्य श्री महाश्रमण जी ने बैंगलुरु की धरा पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फ़रमाया की ज्ञान दर्शन चारित्र और तप ये चार मार्ग मोक्ष की ओर ले जाने में सहायक है । गति - गंता और गंतव्य में मार्ग बहुत महत्वपूर्ण है, सन्मार्ग -उन्मार्ग दो मार्ग है। सन्मार्ग पर चलने से सदगती और उन्मार्ग पर चलने से दुर्गति निश्चित है। हमें किसी गाँव जाना है तो मार्ग तय  करना ज़रूरी हैं, गंतव्य यदि निर्धारित है तो गति गंतव्यानुसार हो। जाना कही है और मंजिल का पता नही तो कहाँ जाएँगे। इसी प्रकार अध्यात्म की साधना का मोक्ष गंतव्य है, और उसका मार्ग है ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप। मार्ग सही दिखाने के लिए मार्गदर्शक भी चाहिए। अध्यात्म के क्षेत्र में अर्हत भगवान हमारे मार्गदर्शक है और उनके प्रतिनिधि आचार्य भगवंत, साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका जो भी सही राह दिखाए वो मार्गदर्शक हो सकता है। अब ...

मिथ्यात्व को त्याज्य बताया गया है - आचार्य श्री महाश्रमण जी

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मिथ्यात्व दृष्टिकोण को छोड़ने को आचार्यश्री ने किया उत्प्रेरित   दो मासखमण की तपस्याओं का हुआ प्रत्याख्यान 13.07.2019 कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): दक्षिण भारत में सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की ज्योति जलाने के लिए अपनी अहिंसा यात्रा के यात्रायित जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी अब अपनी धवल सेना के साथ दक्षिण भारत के दूसरे चतुर्मास के लिए कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के कुम्बलगोडु स्थित आचार्य तुलसी महाप्रज्ञ सेवा केन्द्र में विराजमान हो चुके हैं। आचार्यश्री के यहां विराजते ही मानों यहां एक आध्यात्मिक वातावरण छा गया है। अब चार महीने तक यहां से लोगों को आध्यात्म की गंगा में पावन होने का सुअवसर प्राप्त होगा।  भव्य चतुर्मास प्रवास स्थल परिसर में बने विशाल महाश्रमण समवसरण में नित्य आयोजित होने वाले मंगल प्रवचन में उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि नौ तत्त्वों में पांचवा तत्त्व है-आश्रव। यह कर्मों का बन्धन कराने वाला है। आश्रव पाप कर्म का बन्ध कराता है और ...

तेरापंथ सरताज ने बैंगलुरु की धरा में प्रदान की 23 दीक्षा, कराई अतीत की आलोचना

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तेरापंथ सरताज आचार्य श्री महाश्रमण जी ने बैंगलुरु की धरा में प्रदान की 23 दीक्षा, कराई अतीत की आलोचना  भव्य दीक्षा समारोह ने बेंगलुरु को आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी बना दिया अग्रणी  03.07.2019 रहुतनहल्ली, बेंगलुरु (कर्नाटक), JTN, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी प्रथम कर्नाटक की यात्रा के दौरान बुधवार को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित भिक्षुधाम में 23 दीक्षाएं प्रदान कर तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास में नया स्वर्णिम अध्याय अंकित कर दिया। एक साथ दो मुनि और इक्कीस साध्वी दीक्षा ने प्राद्यौगिकी क्षेत्र में पूरी दुनिया में नाम रखने वाले बेंगलुरु की धरती को आध्यात्मिक चेतना के क्षेत्र में भी मानों अग्रणी बना दिया।  बुधवार को बेंगलुरु में स्थित भिक्षुधाम में आज प्रातः से मानों श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा हुआ था। आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा पूर्व घोषित कार्यक्रमानुसार दीक्षा समारोह का समायोजन होना था। निर्धारित समय से पूर्व ही परिसर में बने...

भिक्षुधाम में एक साथ 23 दीक्षाएं प्रदान करने के पश्चात आचार्य श्री महाश्रमण जी ने की महत्वपूर्ण घोषणाएं

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जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य, ग्यारहवें अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को बेंगलुरु स्थित भिक्षुधाम में एक साथ 23 दीक्षाएं प्रदान कर नये इतिहास का सृजन करने के साथ साथ बैंगलुरू में एक और दीक्षा समारोह और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी के एक और चरण महाप्रज्ञ अभ्यर्थना के आयोजन की घोषणा की। आचार्यश्री ने दीक्षा प्रदान करने के उपरान्त बेंगलुरु अपने चतुर्मास के दौरान 20 अक्टूबर 2019 को एक और दीक्षा समारोह करने की घोषणा की। इसके साथ ही आचार्यश्री ‌ने मुमुक्षु आंचल बरड़िया को इस समारोह में दीक्षा प्रदान करने की घोषणा की।  आचार्य महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी वर्ष के एक और चरण की आचार्यश्री ने घोषणा करते हुए फरमाया कि हुबली में 31 जनवरी 2020 को आचार्य महाप्रज्ञ अभ्यर्थना के आयोजन की घोषणा की।

आचार्य श्री महाश्रमणजी के करकमलों से नवदीक्षितों के दीक्षा पश्चात नामकरण

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दीक्षा समारोह में परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी के करकमलों से नवदीक्षितों के दीक्षा पश्चात नाम मुनि दीक्षा मुमुक्षु धीरज जी   - मुनिश्री धीरज कुमार जी मुमुक्षु ऋषभ जी - मुनिश्री ऋषि कुमार जी श्रेणी आरोहण (समणीजी से साध्वी दीक्षा) समणी कंचन प्रज्ञाजी - साध्वीश्री कृतार्थ प्रभा जी स मणी विनय प्रज्ञाजी - साध्वीश्री वीर प्रभा जी समणी अखिल प्रज्ञाजी - साध्वीश्री आर्यप्रभा जी समणी गंभीर प्रज्ञाजी - साध्वीश्री गीतार्थ प्रभा जी समणी आलोक प्रज्ञाजी-साध्वीश्री आलोकप्रभा जी समणी प्रगति प्रज्ञाजी -  साध्वीश्री प्रणतिप्रभा जी समणी धृती प्रज्ञाजी - साध्वीश्री धृतिप्रभा जी समणी प्रशस्त प्रज्ञाजी - साध्वीश्री प्रवीण प्रभा जी समणी श्वेत प्रज्ञाजी - साध्वीश्री सार्थकप्रभा जी समणी यशस्वी प्रज्ञाजी - साध्वीश्री यशस्वीप्रभा जी समणी दिव्य प्रज्ञाजी  - साध्वीश्री दक्षप्रभा जी समणी उन्नतप्रज्ञाजी - साध्वी श्री उन्नतप्रभा जी साध्वी दीक्षा मुमुक्षु प्रतिभाजी - साध्वीश्री परमार्थप्र...