श्रवण शक्ति का करे सदुपयोग - युगप्रधान आचार्य महाश्रमण


30.01.2023, सोमवार, बायतू, बाड़मेर (राजस्थान), महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज पांच दिवसीय प्रवास सुसंपन्न कर बायतू नगर से मंगल प्रस्थान किया। बायतू की धरा पर मर्यादा महोत्सव जैसा विशिष्ट कार्यक्रम पाकर सम्पूर्ण सिवांची मालानी क्षेत्र अनूठी धर्म भावना से ओतप्रोत नजर गया। मध्यान्ह में आचार्यवर रामसरिया बायतू भोपजी ग्राम के लिए बायतू से प्रस्थित हुए तो श्रद्धालु भावपूर्ण स्वरों से पुनः शीघ्र पदार्पण के घोष लगाते हुए आराध्य की यात्रा के प्रति मंगलकामना प्रकट कर रहे थे। इससे पूर्व प्रातः प्रवचन पश्चात आचार्यश्री तेरापंथ भवन से श्री कानराज, सम्पतराज बालड़ के निवास पर पधारे। मध्यान्ह में यहां से लगभग 05 किमी विहार कर आचार्यश्री रामसरिया बायतू भोपजी में स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में पधारे। आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास यहीं हुआ।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा - मनुष्य एक पचेंद्रीय प्राणी है जिसके पांच इंद्रियां होती हैं। ज्ञान प्राप्ति के लिए कान एवं आंख को मुख्य रूप से महत्व दिया जा सकता है। कान और आंख में भी दोनों में तुलना की जाय तो एक दृष्टि से उनमें आंख का ज्यादा महत्व होता है। आँखों के अभाव में आदमी कुछ देख नहीं सकता वही आँखों के माध्यम से आदमी पैरों से चल सकता है व पढ़कर ज्ञान व स्वाध्याय भी कर सकता है। कानों का भी बड़ा महत्व है। श्रवण पटु व्यक्ति दूर से ही बात को भांप लेता है। हम कानों की पटुता का सदुपयोग करें व दुरूपयोग से बचे यह आवश्यक है। सुनना हो तो भगवद वाणी सुने, अर्हत वाणी एवं अच्छी बातों को सुने।

गुरुदेव ने आगे कहा कि कानों से हम दूसरों का दर्द व दुःख भी सुन सकते हैं। सुनकर उसके दुःख दर्द पर अपनी सहानुभूति व्यक्त करके सांत्वना देने से उसका दुःख भी कम हो सकता है। यह भी कानों का एक अच्छा उपयोग है। श्रवण शक्ति का सदुपयोग कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। कही दो व्यक्ति बात कर रहे है उनकी बातें सुनना, लुक-छुप कर बातें सुनना कान का सही उपयोग नहीं होता। हमारी इंद्रियों का प्रयोग अध्यात्म की दिशा में करे। यह काम्य है।

बायतु के संदर्भ में आचार्य प्रवर ने फरमायादृ बायतु में मर्यादा महोत्सव कालीन अच्छा प्रवास संपन्न हो गया। श्रावक समाज में धर्म, अध्यात्म की चेतना बढ़ती रहे, मंगलकामना। तत्पश्चात मुनि रजनीश कुमार जी ने अपने विचारों की प्रस्तुति दी।

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