भवसागर से पार पाने करे धर्माराधना - आचार्य महाश्रमण


04.02.2023, शनिवार, सिराना, जालोर (राजस्थान),जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी का आज अपनी धवल सेना के साथ जालोर जिले में मंगल प्रवेश हुआ। रेतीले धोरों, खेत खलिहानों से भरी हुई मरुभूमि पर अध्यात्म की गंगा बहाते हुए आचार्य श्री निरंतर गतिमान है। आज प्रातः आचार्यप्रवर ने अरणियाली ग्राम से मंगल विहार किया। मार्ग में कई स्थानों पर स्थानीय ग्रामीणों को पावन आशीष प्रदान करते हुए शांतिदूत गंतव्य की ओर गतिमान हुए। जैसे ही पुज्यप्रवर का बाड़मेर से जालोर जिले की सीमा में मंगल प्रवेश हुआ श्रद्धालुओं ने भक्ति भावों से परिपूर्ण जयघोषों से गुरुवर का स्वागत किया। लगभग 7.3 किमी विहार कर आचार्यश्री सिराना ग्राम के राजकीय विद्यालय में प्रवास हेतु पधारे। चतुर्दशी के अवसर पर आज पुज्यवर की सन्निधि में हाजरी का भी वाचन हुआ। जिसमें आचार्यश्री मर्यादा पत्र का वाचन करते हुए तेरापंथ धर्मसंघ की मर्यादाओं को व्याख्यायित किया।


प्रवचन सभा में प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए गुरुदेव ने कहा– जिस प्रकार नदी व समुद्र को पार करने का नौका एक उपयोगी साधन होता है। उसी प्रकार इस मनुष्य जीवन को भी भवसागर पार करने का साधन कहा गया है। यह मनुष्य जीवन एक नौका के समान है। नौका पार कराती है पर नौका तभी पार लगा सकती है जब वह निश्छिद्र हो। यदि नौका छेद वाली हो तो वह डुबो भी सकती है। यह जीव नाविक व शरीर नौका तथा यह जीवन भव सागर के समान है। इसमें आश्रव रूपी छेद ना लगे। जब आश्रव द्वार बंद हो तो यह नौका हमें पार पहुँचाने वाली बन सकती है। 


गुरुदेव ने आगे कहा की धर्म साधना के द्वारा आश्रव द्वार को हमे बंद करने का प्रयास करना चाहिए। यह शरीर औदारिक शरीर है। जब तक हमारा शरीर सक्षम रहे हमें इसका सही उपयोग करते रहना है। इसको सक्षम रखने की दिशा में भी हम प्रयत्नशील रहें। व्यक्ति समय का धर्माराधना में उपयोग करे यह आवश्यक है। जब तक हमें बुढ़ापा पीडित न करे, बीमारियाँ शरीर पर हावी न हो तथा इन्द्रियाँ कमजोर न पड़े, तब तक हमें कार्यशील रहकर धर्म लाभ ले लेना चाहिए। उसके बाद भी धर्म में हमारा मन लगा रहे। हम विवेक के साथ अपने हर पल को उपयोगी बनाने का प्रयास करते रहें तो इस जीवन की सार्थकता हो सकती है।

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