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Showing posts from January, 2014

आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी का समारोह का दूसरा चरण

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आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी वर्ष के मौके पर आयोजित होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों के तहत गुरुवार को समारोह का दूसरा चरण शुरू होगा। दूसरा चरण 30 जनवरी से पांच फरवरी तक आयोजित होगा। आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी का दूसरा चरण प्रारंभ हो गया है। प्रथम चरण लाडनूं में हुआ तथा बीदासर में चरण नहीं लेकिन शताब्दी वर्ष का महाचरण मनाया गया। जो शताब्दी वर्ष का लक्ष्य है महाव्रती बनाने का क्रम वो बीदासर में हुआ। महाश्रमणजी ने आठ दिवसीय तुलसी जन्म शताब्दी कार्यक्रम हेतु मुनिश्री कुमारश्रमण जी तथा मुनिश्री जयकुमार जी को दिशा-निर्देश दिए। इससे मंत्री मुनि सुमेरमल स्वामी ने कहा कि जब तक तुम पदार्थमुखी रहोगे, धर्म करते जाओगे तो भी भीतर अनुभूति नहीं होगी। पदार्थ की भावना गौण करोगे तब धर्म करने का लाभ मिलेगा।  शुद्धि होते हुए भी हमारी बुद्धि सुख की अनुभूति नहीं कर पाती।

अणुव्रत समिति एवं जमात-ए-इस्लामी के संयुक्त तत्वावधान में संयुक्त प्रेस कोंफ्रेस

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जयपुर.अणुव्रत समिति एवं जमात-ए-इस्लामी के संयुक्त तत्वावधान में 'सामाजिक जीवन में चारित्रिक मूल्यों के महत्त्व ' विषय पर एक संयुक्त प्रेस कोंफ्रेस विधानसभा के पास स्थित होटल इंडियाना क्लासिक में आयोजित की गयी. इस प्रेस कोंफ्रेंस में राजस्थ ान के समस्त मीडिया, न्यूजपेपर्स , टेलीविजन चेनल्स के प्रतिनिधि एवं पत्रकार उपस्थित रहे. प्रेस कोंफ्रेंस में समाज में गिरते हुए चारितिर्क स्तर, समाज में व्याप्त बुराइयों एवं उनसे होने वाले दुष्परिणामों पर अनेक बुद्धिजीवियों एवं गणमान्य व्यक्तियों ने अपने विचार रखे. कोंफ्रेंस में जमात-ए-इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय सचिव इंजीनियर मोहम्मद सलीम, अणुव्रत समिति जयपुर के अध्यक्ष अजय नागौरी, मसीहा संस्थान के फादर श्री विजय पोल, अणुव्रत प्रवक्ता श्री जी.एल. नाहर आदि ने अपने विचार रखे.

साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा का 'चयन दिवस' मनाया

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बुधवार को प्रात: 7.30 बजे जब साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा अपनी सहवृतिनी साध्वियों के साथ शांति निकेतन से चलकर तेरापंथ भवन में आचार्यप्रवर महाश्रमणजी को नियमित क्रम के तहत वन्दना करने पधारे तब हर ओर से साध्वीप्रमुखा को उनके 43वें चयन दिवस (साध्वीप्रमुखा मनोनयन) पर बधाई देने का क्रम प्रारंभ हो गया। इस अवसर पर सहज रूप से बधाई देने का कार्यक्रम एक अनियोजित समारोह में तब्दील हो गया। सभी ने मुक्तकंठ से साध्वीप्रमुखाश्रीजी के साध्वीप्रमुखा पद पर 42 वर्ष सानन्द सम्पन्न होने पर उन्हें बधाई और शुभकामना देने की होड़ सी लग गई। आचार्यप्रवर ने कहा कि जब साध्वीप्रमुखाश्रीजी का मनोनयन हुआ तब वे स्वयं बहुत छोटी थीं और पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी आयु में उनसे काफी बड़े थे। आज संघ विकास में साध्वीप्रमुखाश्रीजी का बहुत बड़ा योगदान है, वे आगे भी इसी रूप में मुझे सहयोग करते हुए संघ विकास में नए आयाम जोड़ती रहें। वे मुझसे तो काफी बड़े हैं, अनुभवी हैं, पूज्य गुरुदेव के साथ एवं आचार्य महाप्रज्ञजी के साथ लम्बे समय तक काम किया है। साहित्य संपदा के क्षेत्र में भी महत्तीय कार्य कर रहे हैं। हमारी ख...

साध्वी ईलाकुमारी जी 'अरिहन्तशरण'

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आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वीश्री ईलाकुमारीजी (वय ५९ वर्ष) का बुधवार दोपहर 3:15 बजे शांति निकेतन सेवा केन्द्र में स्वर्गवास हो गया। गंगाशहर के भूरा परिवार की बेटी ईलाकुमारीजी की दीक्षा आचार्यश्री तुलसी के कर कमलों से हुई थी। इनकी दीक्षा को 4० वर्ष पूर्व हुई थी। वर्तमान में साध्वीश्रीजी की 'लघुसिंह निष्कीडितÓ तप की आराधना कर रही थी। साध्वी ईलाकुमारीजी का तपस्या के प्रति गहरा लगाव था, वर्षों से एकान्तर तप की साधना कर रही थी बहुत ही सेवाभावी, सरल और शांत प्रकृति की भद्र साध्वी थी। उनकी अंतिम यात्रा 4:30 बजे शांति निकेतन सेवा केन्द्र से रवाना होकर, तेरापंथ भवन, अणुव्रत मार्ग  नई लाइन स्थित साध्वीश्री के संसारपक्षीय निज निवास, चौरडिय़ा चौक, मैन बाजार होते हुए पुरानी लाइन स्ििात श्मशान गृह पहुंची, जहां पर साध्वीश्री ईलाकुमारीजी के संसार पक्षीय भाई सुरेन्द्र भूरा ने मुखाग्नि दी। मात्र 1 घंटे की सूचना में ही साध्वीश्री की अंतिम यात्रा में गंगाशहर, बीकानेर, उदासर, भीनासर,  नाल आदि क्षेत्र के श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। मीडिया प्रभारी धर्मेन्द्र डाकलिया ...

जहां स्वीकारने की परम्परा हो वहां अनुशासन रहता है : महाश्रमण

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  गंगाशहर। बुधवार को तेरापंथ भवन में आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा है कि जहां संगठन होता है वहां शासन अनुशासन की अपेक्षा होती है। भारत में पहले राजतंत्र था, राजा-महाराजा का शासन था लोग अनुशासन में रहते थे वर्तमान में लोकतंत्र प्रणाली है। जनता का राज है लेकिन शासन तो अनुशासन से ही चलता है। कैसी भी व्यवस्था हो, किसी भी रूप में व्यवस्था हो लेकिन विकास तभी संभव है जब अनुशासन शासन हो। आचार्यश्री महाश्रमण ने 'शासन अनुशासनÓ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि एक नियामक-निदेशक होना चाहिए, जो हमारा मार्गदर्शन कर सके। जहां सब नेता बन जाए, पंडित बन जाए सब अपने आप को महत्वकांक्षी समझने लगे तो राष्ट्र का दुखी होना स्वाभाविक है। इसलिए हर किसी को अनुशास्ता नहीं बनाया जा सकता। आचार्यश्री ने कहा कि जो स्वयं अच्छा शिष्य नहीं बन सकता वह कभी किसी का गुरु भी नहीं बन सकता। अच्छे गुरु का दृष्टिकोण भी शिष्य के प्रति अच्छा होना आवश्यक है। गुरु अपने शिष्य को अनुशासन में रहकर पिता की तरह, बड़े भाई की तरह ज्ञान देता है तब शिष्य की दृष्टि में गुरु श्रेष्ठ हो जाता है। तेरापंथ में आचार्यों की आज्ञ...

महिलाओं में त्याग स्वभाव और सहनशीलता व्रत बने : कनकप्रभा

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गंगाशहर। तेरापंथ महिला मंडल द्वारा मंगलवार को विराट महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। 'संयम से व्यक्तित्व विकासÓ विषय पर व्याख्यान देते हुए साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने कहा कि जिस व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र में संयम होता है उसमें विकास होता है। नारी एक पवित्र ज्योति है। त्याग उसका स्वभाव और सहनशीलता उसका व्रत है। सहिष्णुता महिला का स्वाभाविक गुण है, लेकिन आजकल सहिष्णुता घट रही है। एक बच्चा भी अपने मन के प्रतिकूल बात को सहन नहीं कर सकता। सहन करने की क्षमता खत्म हो चुकी है। महिलाएं सहनशील बन कर ही परिवार को संस्कारित बनाती हैं। जहां अधिकारों की बात आती है वहां शांति नहीं होती। रामायण व महाभारत का उदाहरण देते हुए कनकप्रभाजी ने कहा कि रामायण हमें कर्तव्यों की प्रेरणा तथा महाभारत हमें हक-हकूक की बात सिखाता है। असंयम से राष्ट्र का पतन होता है। जैन संस्कृति में संयम कण-कण में है। इसलिए जीवन के हर व्यवहार में संयम हो। व्यक्ति को सबसे पहले खाने में संयम रखना होगा। जिस देश में करोड़ों लोग भूखे सोते हैं वहां अन्न का अपमान गलत बात है। विवाह तथा किसी भी समारोह में भोजन की...

तेयुप गंगाशहर का युवा सम्मेलन 27 को

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तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष मनोज सेठिया के अनुसार सोमवार 27 जनवरी को आचार्य प्रवर के सान्निध्य में एक युवा सम्मेलन आयोजित किया गया है जिसका विषय है 'समूह में कैसे रहें?Ó इस युवा सम्मेलन में गंगाशहर परिषद के युवकों के साथ बीकानेर, उदासर, भीनासर, नाल, देशनोक और नोखा के युवकों को भी आमंत्रित किया गया है। आचार्य प्रवर के प्रवचन के उपरान्त एक अन्य सत्र के माध्यम से भी संभागियों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। मीडिया प्रभारी धर्मेन्द्र डाकलिया के अनुसार सोमवार 27 जनवरी को प्रात: 7:51 बजे आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में चौरडिय़ा चौक में आचार्य महाप्रज्ञ स्तम्भ का भी लोकार्पण होगा। चौरडिय़ा परिवार के विमलसिंह के अनुसार इस संदर्भ में व्यापक तैयारियां की जा रही है। आचार्य प्रवर के चौरडिय़ा चौक में पदार्पण को देखते हुए मोहल्ले के लोगों में अपूर्व उत्साह दिखाई पड़ रहा है।

नशा न करने की ली प्रतिज्ञा

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गंगाशहर . व्याख्यान के दौरान तेरापंथ किशोर मंडल के अलावा लगभग सात स्कूलों के विद्यार्थी जिनमें शिव सैकेण्डरी स्कूल, आदर्श विद्या मंदिर, बाफना अकादमी, अमर ज्योति विद्यालय, सेंट श्री खेतेश्वर, श्री पुर्वेश्वर ज्ञान मंदिर, श्री गोपेश्वर विद्या पीठ आदि स्कूलों से करीब 400 बच्चे आए। संस्कार और ज्ञान की बात सीखने आए बच्चों को महाश्रमणजी ने नशा न करने की प्रतिज्ञा भी करवाई। आचार्यश्री महाश्रमणजी के अभिनन्दन शृंखला में गंगाशहर की साध्वियों ने 'आई आज उषा खुशहालÓ गीतिका प्रस्तुत की। साध्वीश्री सोमलता ने अभिनन्दन करते हुए कहा कि अपनी जन्मभूमि पर महाश्रमणजी का स्वागत कर सुख की अनुभूति हो रही है। तेरापंथ महिला मंडल की संतोष बोथरा ने बताया कि एक विराट महिला सम्मेलन का आयोजन 28 जनवरी को रखा गया है। सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 27 जनवरी को रजिस्ट्रेशन किया जाएगा।

संस्कार ही सबसे बड़ी सम्पदा : आचार्य महाश्रमण

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  गंगाशहर। शनिवार सुबह तेरापंथ भवन में नियमित प्रवचन शृंखला के तहत निर्धारित विषय 'सुविनीत कौन?Ó पर व्याख्यान देते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि जो विनीत होता है उसे सम्पदा मिलती है और अविनीत होता है उसे विपदा। जो विद्यार्थी इस बात को समझले वह शिक्षा प्राप्त कर लेता है। माता-पिता अपनी संतान को छोटी उम्र में ही विद्या संस्थान भेज देते हैं। वे सोचते हैं कि ज्यादा वर्ष तक विद्या संस्थान में रहेगा तो आत्मनिर्भर बनेगा, कमाई के लायक बन पाएगा। ऐसी उम्मीद रखकर अभिभावक अपने बच्चों को शाला भेजते हैं लेकिन यदि वह शिक्षण संस्थान उन्हें संस्कार और ज्ञान नहीं देता है तो वह संस्थान असफल है। आचार्यश्री ने कहा कि आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला शत्रु है और परिश्रम के समान कोई बंधु नहीं। सुविनीत वही हो सकता है जिसमें अच्छे संस्कार हो, जो शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन विनम्रता से करता है। गुरु के साथ-साथ सभी से शिष्टव्यवहार हो। जो स्वभाव से शांत होता है और दूसरों को सम्मान देता है, दूसरों की अधीनता में भी औचित्य के साथ रहे वैसा व्यक्ति सुविनीत होता है। सुविनीत वह होता है जिस...

आचार से ही विद्या और कला शोभित होती है : आचार्य महाश्रमण

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आचार से ही विद्या और कला शोभित होती है : आचार्य महाश्रमण गंगाशहर। आचार प्रथम धर्म है, विद्वता बाद में है। विद्वता अच्छी है, प्रशंसा लायक है पर अहंकारमुक्त विद्वता हो। आचार का ही एक अंग विद्वता है। हम ज्ञान सम्पन्न, विद्वता सम्पन्न बनें लेकिन आचार की उपेक्षा न करें। आचार से ही विद्या और कला शोभित होती है। उक्त विचार आचार्यश्री महाश्रमण ने अपने निर्धारित विषय 'आचार से शोभित विद्या और कलाÓ के अंतर्गत शुक्रवार को सुबह तेरापंथ भवन में कहे। आचार्यश्री ने कहा कि हमारे जीवन में आचार और विद्या का महत्व है, लेकिन इनमें पहले किसका महत्व है इस पर विचार करना जरुरी है। आचार का महत्व ज्यादा है जीवन में। जहां आचार संबंधी बात है वहां ज्ञान का पहला स्थान है। साधु के पांच महाव्रत का होना आचार है लेकिन पांच महाव्रत क्या होते हैं, कैसे होते हैं इसका ज्ञान होना भी जरुरी है। दीक्षा से पहले शिक्षा लेनी आवश्यक है। दीक्षा लेने से क्या होता है, दीक्षा लेने के बाद क्या किया जाता है इसका ज्ञान होना जरुरी है। अर्थात् दीक्षा से पूर्व नवतत्व का ज्ञान करवाना आवश्यक है फिर दीक्षा की अनुमति मिले।...

'अणुव्रत' हमें सूक्ष्म से भी सूक्ष्म दृष्टि प्रदान करता है - शम्भु चौधरी

सूर्य और अंधेरे की ताकत का इस बात से सहज ही अंदाज लगाया जा सकता हे कि दोनों एक दूसरे के समानान्तर कभी नहीं रहते। जबकि सूर्य को अपनी शक्ति से ही देदीप्यमान होना पड़ता है और अंधेरे के साथ प्राकृतिक ने हवा, पानी और बादलों को सहयोगी बना दिया। फिर भी पल भर का अन्तर नहीं रहता एक दूसरे आने-जाने में। प्रकाश का प्रवेश ही काफी होता है, अंधेरे को मिटाने के लिए। हाँ ! प्रकाश का बना रहना ही अंधेरे को हटाना कहा जा सकता है। आचार्यवर तुलसी जी इस पृथ्वी पर एक अखण्ड दीप के समान आलोकित महानआत्मा हैं जो हम सबके जीवन को ज्योतित करने के लिए अवतीर्ण लिए हैं। आचार्यवर तुलसी जी इस पृथ्वी पर एक अखण्ड दीप के समान आलोकित महान आत्मा हैं जो हम सबके जीवन को ज्योतित करने के लिए अवतीर्ण लिए हैं। इस अखण्ड दीप का जलना इस बात का द्योतक है कि भले ही अंधकार कितना ही शक्तिशाली, बलवान, ताकतवर, क्रोधी या उद्दण्ड रहा है, भीतर से वह काफी कमजोर और डरपोक भी है, जो एक छोटे से दीप की टीमटीमाती लौ के सामने भी नहीं खड़ा रह पाता। इस अखण्ड दीप का जलना इस बात का द्योतक है कि भले ही अंधकार कितना ही शक्तिशाली, बलवान, ताकतवर, क्रोध...